लखनऊ– “भारत की स्वतंत्रता में मुसलमानों की भूमिका” विषय पर एक विचारोत्तेजक संगोष्ठी का आयोजन उत्तर प्रदेश प्रेस क्लब, लखनऊ में किया गया। इस अवसर पर देश के स्वतंत्रता संग्राम में मुसलमानों के महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक योगदान पर विस्तृत चर्चा की गई। कार्यक्रम में कई प्रतिष्ठित लेखक, इतिहासकार, राजनेता और सामाजिक कार्यकर्ता शामिल हुए। कार्यक्रम का संचालन हमाम वहीद द्वारा किया गया, जबकि वरिष्ठ कांग्रेस नेता श्री दिनेश कुमार सिंह की अध्यक्षता में कार्यक्रम सम्पन्न हुआ। संगोष्ठी का आयोजन श्री नावेद नक़वी द्वारा किया गया, जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में सभी समुदायों के योगदान को याद रखने और उसे आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाने की आवश्यकता पर बल दिया। संगोष्ठी की शुरुआत प्रसिद्ध इतिहासकार और “लखनऊ 1857” पुस्तक के लेखक डॉ. रोशन तक़ी के उद्बोधन से हुई। उन्होंने लखनऊ के मुसलमानों द्वारा 1857 की क्रांति में दिए गए बलिदानों को उजागर किया। इसके पश्चात डॉ. फखरुद्दीन वहीद, “स्वतंत्रता आंदोलन में देवबंद की भूमिका” पुस्तक के लेखक, ने मुस्लिम विद्वानों के योगदान विशेषकर शाह वलीउल्लाह और उनके पुत्र के प्रयासों को विस्तार से बताया, जिन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन को वैचारिक और धार्मिक आधार प्रदान किया। डॉ. शहज़ाद आलम, जिलाध्यक्ष, लखनऊ कांग्रेस कमेटी ने भी अपने संबोधन में मुसलमानों की जमीनी भागीदारी और उनके संघर्षों को रेखांकित किया। श्री रूद्र रमन सिंह ने अपने वक्तव्य में हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसालें प्रस्तुत करते हुए काकोरी कांड की याद दिलाई, जिसमें दोनों समुदायों ने कंधे से कंधा मिलाकर अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष किया। अख्तर मोदी ने आज़ादी के बाद भारत के विकास पर प्रकाश डालते हुए बलिदानों को याद किया, जबकि हुस्ना आरा ने विशेष रूप से मुस्लिम महिलाओं के त्याग और संघर्ष की ओर ध्यान आकर्षित किया। पूर्व मंत्री डॉ. मसूद ने सर सैयद अहमद खान की शिक्षा के क्षेत्र में भूमिका को रेखांकित किया और कहा, “जब भी राष्ट्र ने खून माँगा, मुसलमानों ने दिया है और भविष्य में भी देने को तैयार हैं।” उन्होंने हज़रत अली का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्होंने विज्ञान की दिशा में अग्रणी सोच रखते हुए कहा था, “आसमानों में भी रास्ते हैं।” कार्यक्रम में अंतिम वक्ता के रूप में श्री शहनवाज़ क़ादरी, “लहू बोलता भी है” के लेखक, ने मुसलमानों द्वारा स्वतंत्रता आंदोलन में दी गई कुर्बानियों को याद किया और इस बात पर ज़ोर दिया कि उनका रक्त भी इस देश की आज़ादी के लिए बहा। श्री शहनवाज़ क़ादरी ने कहा कि मुसलमानों में राजनीतिक जागरूकता की भारी कमी है और भारत की आज़ादी की लड़ाई में मुसलमानों की भूमिका को अक्सर नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है, जबकि इतिहास गवाह है कि मुसलमानों ने हर मोर्चे पर अपनी कुर्बानियाँ दी हैं। उन्होंने बताया कि 1763 में मजनूं शाह और 1788 में करबाडी आंदोलन जैसे कई आंदोलनों ने ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ जन-जागृति की लहर पैदा की थी। वलीउल्लाही आंदोलन और तहरीक-ए-अदम-त (Non-Cooperation Movement) जैसे प्रयासों ने भारत की स्वतंत्रता संघर्ष को एक नई दिशा दी। 1912 में केरल आंदोलन भी एक अहम पड़ाव था जिसमें मुसलमानों की बड़ी संख्या ने भाग लिया। इस पूरे आंदोलन के दौरान 2337 लोगों को फांसी दी गई और 45,000 से अधिक स्वतंत्रता सेनानियों को जेलों में डाला गया। उन्होंने उल्लेख किया कि मौलाना बरकतउल्ला भोपाली, जिन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन को विदेशों तक पहुँचाया, को सैन फ्रांसिस्को में फांसी दी गई। जौनपुर के सय्यद मुश्तबा हुसैन भी एक प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी रहे। “ख़ुदाई ख़िदमतगार” जैसे आंदोलनों ने भी स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और यह बताता है कि मुसलमानों ने केवल धार्मिक स्तर पर नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर भी स्वतंत्रता के लिए बड़ी कुर्बानियाँ दीं। खिलाफ़त आंदोलन को उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को गति देने वाला एक महत्वपूर्ण पड़ाव बताया, जिसने गांधी जी और मुस्लिम नेतृत्व के बीच एकता की भावना को मज़बूत किया। लेकिन आज़ादी के बाद मुसलमानों को हाशिये पर ढकेल दिया गया और उनकी सामाजिक-आर्थिक हालत बद से बदतर होती गई। दुर्भाग्यवश, वही हालात आज भी दोहराए जा रहे हैं। कार्यक्रम के समापन पर अध्यक्षीय भाषण देते हुए वरिष्ठ वक्ता श्री दिनेश सिंह ने कहा कि भारत की स्वतंत्रता “विविधता में एकता” की भावना के कारण ही संभव हो सकी। उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम के ऐतिहासिक प्रसंगों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि इस आंदोलन में सभी समुदायों, विशेषकर मुस्लिम समाज, ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने मौलाना अशफाकउल्लाह खां और फैज़ाबाद के योगदान को रेखांकित करते हुए बताया कि किस प्रकार मुस्लिम समुदाय ने न सिर्फ सक्रिय भागीदारी निभाई बल्कि आर्थिक सहायता भी प्रदान की। उन्होंने चेताया कि आज देश में एक बार फिर वैसी ही परिस्थितियाँ पैदा हो रही हैं, जहाँ संविधान और न्यायपालिका की मर्यादा से छेड़छाड़ की जा रही है। उन्होंने वर्तमान सरकार पर “फूट डालो और राज करो” की नीति को बढ़ावा देने का आरोप लगाते हुए कहा कि हमारे नेता श्री राहुल गांधी इस विभाजनकारी राजनीति के खिलाफ सच्चाई और एकता का आंदोलन मजबूती से आगे बढ़ा रहे हैं। श्री सिंह ने यह भी कहा कि किस प्रकार वर्तमान शासन द्वारा स्कूली पाठ्यक्रमों में बदलाव कर इतिहास को तोड़ा-मरोड़ा जा रहा है और सच्चे नायकों के योगदान को छुपाया जा रहा है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि कुछ कॉर्पोरेट समूह विदेशी शक्तियों, विशेषकर अमेरिका, के इशारे पर काम कर रहे हैं और देशहित के खिलाफ भूमिका निभा रहे हैं। अपने संबोधन के अंत में उन्होंने कहा, “अब समय आ गया है कि भारत के सभी समुदाय आपस में सत्य का संवाद करें, ताकि देश में एकता और भाईचारे की भावना को फिर से स्थापित किया जा सके।” कार्यक्रम का समापन आयोजक श्री नावेद नक़वी द्वारा धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ, जिन्होंने सभी वक्ताओं और उपस्थित लोगों का आभार व्यक्त किया। यह आयोजन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की बहुलतावादी और समावेशी विरासत को याद दिलाने वाला रहा। सभी वक्ताओं ने इस प्रकार के आयोजनों की निरंतरता की आवश्यकता जताई ताकि युवा पीढ़ी को देश के वास्तविक इतिहास से अवगत कराया जा सके। इस अवसर पर अनिल कुमार सैयद शोएब एडवोकेट शमशुल हक उम्र मसूद अहमद शाहनवाज खान अख्तर मालिक उमर शमशेर काशिफ सरफराज जाहिद आजरा मुबीन मोहम्मद एडवोकेट फैजान एडवोकेट वालीउल्लाह शबाब नकवी रॉबिन, जितेंद्र कुमार आफताब अहमद अनीस अख्तर मोदी जुबेर खान शाहनवाज खान, अख्तर मलिक नाजिम उद्दीन मेराज वली, तनवीर हसन जाहिद, आफताब, शाहनवाज अम्मार आज़िब एहतेशर, मालिक प्रज्ञा मिश्रा, बाबा सिद्दीकी,आदि उपस्थित रहे.
भारत की स्वतंत्रता में मुसलमानों की भूमिका: शहज़ाद आलम
