रायबरेली में प्रदेश का पहला पायलट प्रोजेक्ट : गौशाला के गोबर से निर्मित ‘गौ-शक्ति ऑर्गेनिक’ उत्पादों के प्रचार-प्रसार हेतु कार्यशाला आयोजित

रायबरेली में प्रदेश का पहला पायलट प्रोजेक्ट : गौशाला के गोबर से निर्मित ‘गौ-शक्ति ऑर्गेनिक’ उत्पादों के प्रचार-प्रसार हेतु कार्यशाला आयोजित

 

रायबरेली, 30 जुलाई 2026प्रदेश में पहली बार जनपद रायबरेली में पायलट प्रोजेक्ट के तहत गौशाला के गोबर से निर्मित ‘गौ-शक्ति ऑर्गेनिक’ उत्पादों के प्रचार-प्रसार के उद्देश्य से एक कार्यशाला का आयोजन बी-पैक्स उत्तरपारा, विकास खंड राही में किया गया।   कार्यक्रम का आयोजन मुख्य विकास अधिकारी अंजुलता के मार्गदर्शन में सहकारिता विभाग, रायबरेली एवं राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (एनआरएलएम) के तत्वावधान में सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम की अध्यक्षता जिला सहकारी बैंक लिमिटेड, रायबरेली के अध्यक्ष विवेक विक्रम सिंह ने की। कार्यशाला का आयोजन बी-पैक्स उत्तरपारा के कैडर सचिव रविकांत शुक्ल एवं समिति के संचालक मंडल द्वारा कराया गया।

इस पायलट प्रोजेक्ट का उद्देश्य ग्रामीण महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाना, गोबर आधारित जैविक उत्पादों के निर्माण को बढ़ावा देना तथा पर्यावरण संरक्षण एवं जैविक खेती को प्रोत्साहित करना है कार्यक्रम को संबोधित करते हुए जिला सहकारी बैंक लिमिटेड के अध्यक्ष विवेक विक्रम सिंह ने कहा कि विगत छह से सात वर्षों में सहकारिता विभाग निरंतर नई ऊंचाइयों की ओर अग्रसर हुआ है तथा विभाग में अनेक नवाचार परिलक्षित हो रहे हैं। उन्होंने कहा कि यह पहल ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाने के साथ-साथ जैविक कृषि को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।कार्यक्रम में उपस्थित अधिकारियों ने बताया कि गोबर से निर्मित उत्पादों का वितरण जनपद की सहकारी समितियों, सहकारी संस्थाओं तथा गौशालाओं के माध्यम से किया जाएगा। इससे गौशालाओं को आर्थिक मजबूती मिलेगी, स्वयं सहायता समूहों को नए रोजगार के अवसर प्राप्त होंगे तथा कृषकों की आय में वृद्धि के साथ पर्यावरण संरक्षण को भी बल मिलेगा।कृषि विज्ञान केंद्र, दरियापुर के कृषि वैज्ञानिक शैलेन्द्र विक्रम सिंह ने बताया कि रासायनिक उर्वरकों का केवल लगभग 20 प्रतिशत भाग ही पौधों द्वारा उपयोग किया जाता है, जबकि शेष पर्यावरण में मिलकर प्रदूषण का कारण बनता है। उन्होंने कहा कि कृषि भूमि मे कार्बन का स्तर लगभग 0.75 प्रतिशत होना चाहिए, लेकिन पिछले लगभग 60 वर्षों में इसमें लगातार कमी आई है। भारतीय पारंपरिक कृषि पद्धति में मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने के लिए जीवामृत के उपयोग पर बल दिया गया है, जिसके लिए मिट्टी में केंचुओं की उपस्थिति आवश्यक है और यह केवल गौ-आधारित एवं जैविक खेती से ही संभव है।कार्यशाला में सहायक आयुक्त एवं सहायक निबंधक सहकारिता, जिला कृषि अधिकारी, डीसी एनआरएलएम, डीडीएम नाबार्ड सहित अन्य जनपद स्तरीय अधिकारियों ने सहभागिता की। इसके अतिरिक्त स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाओं तथा बड़ी संख्या में क्षेत्रीय कृषकों ने भी उत्साहपूर्वक प्रतिभाग किया।

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